उड़ आया बचपन

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आज हवा के झोंके संग कुछ बादल आये,
बारिश का सा आलम था पर उम्मीद कम,
पिछली बार बस बूंदों की याद भर दिला गए थे।

काफी कुछ उड़ा ले जाती हैं हवा अपने आगोश में,
पर कभी कभी कुछ ले भी आती हैं तोहफे सा,
शायद यही से return गिफ्ट का दौर चला हो?

आज उड़ते उड़ते आँगन में मेरे किसी का बचपन आया,
कागज़ का बना एक हवाई जहाज था,
कुछ पीले कुछ नीले रंग का।

वैसा ही जैसे बासी अखबार से बाबुजी बना देते थे।
पुरानी खबरें ताज़ा तरीन करके मैं, उड़ा देती थी।
मेरी अठखेलियों पर बाबूजी कितना हँसते।

कभी फ़ैली छत्त, कभी लॉन में कुर्सी लगाये वो बैठा करते,
पुरानी कॉपी के पन्नो से कभी नाव, कभी चिड़िया बना देते।
आज दो बाय दो की बालकोनी में बचपन पड़ा हैं किसी का!

सोचा हाथ बढ़ा कर उठा लू, पर डरती हूँ,
मेरे बचपन सा कहीं फुर्र उड़ गया तो?
उम्र का आधा दौर गुज़र गया हैं कमबख्त,
पर बचपन फिर सिर उठा कर लौट आता हैं।

ताने कसता हैं यूँही हँसते हँसते, “बहुत जल्दी थी तुम्हे बड़ी होने की।
याद हैं बाबूजी कहा करते थे, यूँही नन्ही रहना गिलहरी जैसी,
बिटिया बड़े होने में बहुत फेर हैं दुनिया के।”

नाराज़ होकर गाल कुप्पा हो जाते थे
मुझे तो बड़ा होना हैं बाबा, दुनिया की चकाचोंध को जीना हैं बाबा

कुछ बोले नहीं थे वह, बस चीड़ के जंगल की तरफ एक टक देखते रहे।
सालों की खायी उनके आँखों की उदासी आज भी नहीं भर पायी है।

सच कहा था बाबूजी ने, बड़ो की दुनिया में बहुत हेर-फेर हैं।
दिल को छलनी करता दिमाग का अजब खेल हैं।

आज एक बचपन करवट लिए मेरे सिरहाने सोया हैं।
जल्द बड़े होने के सपनो में खोया है।
फिर वही शब्द बाबूजी के मेरे कानो में गूंजते है,
“बचपन में रहना नन्हे, बडप्पन में बड़े बहुत छलते है।”

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