मेघ तुम मन भर बरस जाओ

थोड़ा और आज छलक जाओ मेघ तुम मन भर बरस जाओ बहुत केहर बरसा चूका है सूरज अपना धरती तरस गयी, सावन रह गया सपना तप तप करके सूख चूका है उसका यौवन अमृत जल तुम छलका दो की खिल जाए मधुबन नीर नदी सब आग निगल कर सूख चुके हैं वृक्ष भी तुम्हारी राह …

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धूल बहुत थी।

I grew up in the small city of Dehradun. The influence of the town just rubs into your personality and no matter where you go you will always yearn for the little pleasures it yields. A mountain range to boast of, a canal flowing through the city, a forest, huge open bungalows, Mango and Litchi trees and my childhood...

धुंधली यादें

चंद गलियों से होकर गुज़री ज़िन्दगी, कुछ लम्हे भर की साँसे; आज चलते चलते रुक गयी घड़ी की सुईयां। लो ख़त्म हुआ आज यह जीने का भ्रम! बस कुछ दिन पहले ही की तो बात हैं वो नंगे पाँव दौड़ा करती थी, इस आँगन की गीली मिट्टी में उसकी खुशबू बसा करती थी। कुछ दूर …

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बचपन बहुत याद आता हैं

हलकी हलकी धुंद की चादर ओढ़े, सूरज झाँक रहा खिड़की से, नर्म कम्बल की गर्मी को हटाकर जब आँख खोली, घड़ी की सुईयाँ हँस रही थी, देरी के ताने कस रही थी. अच्छा था वह बचपन शायद, जब तुम एक और कम्बल उढ़ाते ठण्ड बहुत हैं सो जा बेटा कह कर अलार्म बंद कर जाते कुछ …

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राम कहाँ से लाएगा?

आया हैं त्यौहार दश्हेरा याद बहुत कुछ करा जाएगा, गाजे बाजे चका चौन्ध में आज फिर रावण जल जायेगा l आसान हैं एक पुतले पर तीर चलाना पर दशानन से आँख कैसे मिलाएगा? जब पूछेगा वह तुझसे तेरा सच अपने अंदर राम कहाँ से लाएगा?   नौ दिन देवी पूजी तूने क्या सच में स्त्री …

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