घर में बसते थे शिव, आज मन शिवालय हो गया

आँखें मूँद औंकार गूंजा अंतर्मन में, हे शिव तुमने लिया मुझे, आज अपने आलिंगन में। जूंझ रहा था जीवन जिससे, वह प्रलय अंत हो गया, घर में बसते थे शिव, आज मन शिवालय हो गया। साधू भी तुम, साधक भी तुम, हे भोलेनाथ, अठखेलियां करते बालक भी तुम, तुमको क्या मनाऊँ मैं, पिता सामान पालक... Continue Reading →

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चुप्पी

कभी उनकी आँखों में बसते थे हम, बातों का वो मंज़र रूहानी था। नज़रों में आज भी चमक रहती हैं उनकी बस मेरे अल्फाज़ कमबख्त फ़ोन चुरा ले गया। यूँ तो दिलबर की चुप्पी से शायर डरा नहीं करते, आँखों की जुबां भी समझना आता हैं हमको। आँखें पढ़ने की गुस्ताखी कमबख्त दिल करे कैसे... Continue Reading →

लेखक हूँ, पर क्या लिखूँ ?

यूँ ही कुछ लिख लेता हूँ, लोग कहते हैं की कहानी अच्छी कह देता हूँ । मंज़र अलग से नज़र आते है मुझे , शब्दों का रुख मोड़ स्याह कलम से खेलता हूँ। पर डर लगता हैं आजकल कलम को मेरी, शब्दों के मेरे खेल से कहीं अनवर बुरा ना मान जाये? अभी कुछ दिन... Continue Reading →

बसंत की बारिश

उस तानाशाह सूरज को तुम अपने वश में कर लेते हो, बादल अपने आलिंगन से तुम, सूखी वसुधा को तर लेते हो। घनघोर घटा, मदमस्त हवा, हरियाली झूम लहलहा उठी नीर, नदी सब कह रहे, तुम धारा की संजीवनी। कुछ बूँदें अब बरसा दो तुम अल्हड़ बसंत निहाल हो सर्द हवाओं की मार के बाद... Continue Reading →

कुछ अनकही सी ज़िन्दगी

आँखों की चमक में छिपा एक सैलाब है, तुम्हारी तो हँसी में भी एक इंकलाब हैं, रात ग़मों की स्याही से और गहराई उसके मंसूबों को नाकाम करती तुम्हारी मुस्कान - एक पोशीदा नक़ाब है...

बादल और मैं

कुछ इस तरह आज बादल को ज़मीन पर उतरते देखा जैसे पूछ रहा हो, "चलोगी मेरे साथ? तुम्हे लेने आया हूँ इस भीड़ के परे, आओ थाम लो मेरा हाथ।" मन तो मेरा भी हुआ की बारिश की बूंदों में छिप कर निकल चले इस कोलाहल से कहीं दूर। "धुप में पैर नहीं जलेंगे तुम्हारे,... Continue Reading →

आगाज़

रात गहरी हो चली पर बंद दुकानों के आगे अब भी चकाचौंध है । खनकती चूड़ियों के बीच आज मेहँदी का शोर है । कुछ हाथ भर का इंतज़ार लिए गुलाबी सा अक्स बातों में खोया है । सड़क किनारे लैंप पोस्ट की रौशनी आज कितनी चम् चमा रही है । दिवाली में तो वक्त... Continue Reading →

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