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चुप्पी

कभी उनकी आँखों में बसते थे हम, बातों का वो मंज़र रूहानी था। नज़रों में आज भी चमक रहती हैं उनकी बस मेरे अल्फाज़ कमबख्त फ़ोन चुरा ले गया। यूँ तो दिलबर की चुप्पी से शायर डरा नहीं करते, आँखों की जुबां भी समझना आता हैं हमको। आँखें पढ़ने की गुस्ताखी कमबख्त दिल करे कैसे... Continue Reading →

बसंत की बारिश

उस तानाशाह सूरज को तुम अपने वश में कर लेते हो, बादल अपने आलिंगन से तुम, सूखी वसुधा को तर लेते हो। घनघोर घटा, मदमस्त हवा, हरियाली झूम लहलहा उठी नीर, नदी सब कह रहे, तुम धारा की संजीवनी। कुछ बूँदें अब बरसा दो तुम अल्हड़ बसंत निहाल हो सर्द हवाओं की मार के बाद... Continue Reading →

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